बुधवार, 19 नवंबर 2008

मेरे हमदम मुझे तू माफ़ कर दे

मेरे हमदम मुझे तू माफ़ करदे दूर हूँ तुझसे
मेरी जिंदगी को घेरे हैं बदल बहुत काले

कभी एक ख्वाब सा था कुछ कई रंगीन बातें थी
समय के थापर खा जाने कहाँ गिरा डालें

मैं हूँ पत्ता एक सूखा सा गिरा हूँ पेड़ से अपने
न जाने कब कोई आकर के अब मुझको जला डाले

कि देख मौत मेरी वो खड़ी अब मांगती मुझको
तू चाहे रोक ले मुझको जो चाहे छोड़ भी डाले

जहाँ भी जा रहा हूँ बंद हर दरवाजा है मुझपर
न जाने कौन सी चाभी से खुलते ये सभी ताले

मेरा माजी, मेरा किस्सा न कोई पूछना मुझसे
भरा है दर्द से इतना , कि न धरती डूबा डाले

मैं सदमे में हूँ थोड़ा मुझे खामोश रहने दे
मेरी आवाज आज न कहीं तुझको रुला डाले

3 टिप्‍पणियां:

deepak ने कहा…

"shayad unhe aankhon ki jubaan padana nahi aata"

Nikhil Bhaskar ने कहा…

great thoughts....keep going

manish ने कहा…

thanx :)